*हमारी पूर्वोत्तर भारत की यात्रा- यात्रा वृत्तांत- पढ़े पूर्वोत्तर भारतीय यात्रा की पूरी कहानी*
देव भूमि जे के न्यूज-
15/11/2024-से26/11/2024तक दस दिवसीय यात्रा हेतु मैं आज सपत्नीक पूर्वोत्तर भारत की यात्रा पर निकला हुआ हूं। मेरा मानना है कि यह अनमोल जीवन प्रकृति का उपहार है।समय पर सभी कार्यों को निपटाने की कोशिश करना चाहिए, और कुछ समय प्रकृति से साक्षात्कार के लिए अवश्य ही निकालना चाहिए।जब तक हाथ पैर,शरीर चलने के अनुकूल हो तो चरैवेति- चरैवेति के मंत्र को आत्मसात कर ईश्वर की बनाई हुई कलाकारी- चित्रकारी को नजदीक से अवलोकन करना चाहिए। हमें जब भी अनुकूल वातावरण मिलता है, निकल पड़ते हैं एक अनदेखी- अनछूए अनंत यात्रा पर।
इस प्रकार जीवन रोमांच से भर जाता है।और प्राकृतिक श्रृंगार -सौंदर्य हमारे जीवन में विविध सतरंगी छटा बिखेर देती है।
मेरी ट्रेन नंबर 14318आज सुबह6.15 पर योगनगरी ऋषिकेश से हज़रत निज़ामुद्दीन (दिल्ली) के लिए नियत समय पर खुल गई। रूड़की पहुंचने पर एक फौजी भाई सपरिवार हमारे सीट के सामने विराजमान हुए बातों-बातों में पता चला कि वो भी राजधानी एक्सप्रेस से ही गुवहाटी जाएंगे। हमारी ट्रेन 1.30पर हज़रत निज़ामुद्दीन सही समय पर पहुंचने वाली थी।पर फौजी भाई से बातचीत का सिलसिला चला और उन्होंने कहा कि हम तो जब भी जाते हैं इस ट्रेन को गाजियाबाद में छोड़ कर लोकल ट्रेन पकड़कर नई दिल्ली आधे घंटे में पहुंच जाते हैं। सलाह सही लगा, हम उनकी कही बातों पर गंभीरता से विचार किया और मन बनाया कि हम इनके साथ गाजियाबाद उत्तर कर नई दिल्ली आसानी से पहुंच जाएंगे। हज़रत निज़ामुद्दीन से नई दिल्ली आने की झंझट से मुक्ति मिलेगी।
गाजियाबाद आने पर हम सपत्नीक और वे सपरिवार उत्तर गये। स्टेशन पर उतरने के बाद हम पर जो बीती उसका ज़िक्र करना बेहद जरूरी है। कोई भी निर्णय व्यक्ति को कैसे परेशानी में डालता है,इस निर्णय से कितनी परेशानी हुई,वो केवल हम ही महसूस कर सकते हैं।
हमारी ऋषिकेश- दिल्ली की ट्रेन 12.30पर गाजियाबाद पहुंच गई।पर स्टेशन पर पता चला कि लोकल ट्रेन अभी अभी निकल गई।अब तीन बजे दुसरी ट्रेन है।
हम तेजी से दुसरा विकल्प ढूंढने लगे,हम चार नंबर प्लेटफार्म पर खड़े होकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे कि चार नंबर पर ट्रेन 1.30पर एक दुसरी ट्रेन आई। पता चला कि वो पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाएगी। खैर मन मारकर कोई विकल्प नहीं दिखाई देने पर नहीं हम उसे ट्रेन में बैठ गए लगभग आधे घंटे बाद 2:00 बजे वह ट्रेन पुरानी दिल्ली के लिए चल पड़ी यात्रियों से पूछने पर पता चला कि वह ट्रेन 8 घंटे लेट है सुपरफास्ट ट्रेन होने के बावजूद भी 8 घंटे लेट होना अपने आप में मायने रखता है, खैर जो भी हो। इस ट्रेन की रफ्तार देखकर हमारा मन बैठने लगा था कि शायद अब हम इस यात्रा से वंचित हो जाएंगे बार-बार 139 पर शिकायत करने के बाद यह ट्रेन लगभग 3:50 पर पुरानी दिल्ली स्टेशन पहुंची! भाग मिल्खा भाग और ईश्वर को सर्वस्व समर्पित कर हम मेट्रो स्टेशन की तरफ भागे, किसी प्रकार टिकट लेकर 10 मिनट में हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए। वहां कुली लेकर जब प्लेटफार्म की तरफ बढ़े तो 4:20 हो चुके थे। तभी आशा की किरण जागी और ट्रेन हमें दिखाई दी 4:05 पर किसी प्रकार ट्रेन में हम बैठ गए हमने जरा सी भूल और गलती के कारण जो निर्णय लिया था बेहद गलत निर्णय था, परंतु ईश्वर की कृपा से हम अपनी सीट पर बैठ गए और 12 मिनट लेट से यह ट्रेन नई दिल्ली से निकल पड़ी।
मेरी यह पूर्वोत्तर भारत स्पेशल 11 दिवसीय यात्रा है,इस दौरान हम कामाख्या शक्तिपीठ मंदिर ,दार्जिलिंग, गंगटोक, शिलांग, मेघालय ,नामची, जलपाईगुड़ी , दार्जिलिंग,चेरापूंजी सहित तमाम जगहों पर घुमेंगे। राजधानी एक्सप्रेस से 4.32बजे नई दिल्ली से गुहाटी के लिए प्रस्थान किया।
हमारी यह ट्रेन कानपुर / लखनऊ/इलाहाबाद/वाराणसी/दानापुर /पटना/कटिहार/जलपाईगुड़ी होते हुए गुवहाटी रेलवे स्टेशन नियत समय से लगभग एक घंटा लेट 16 नवंबर को 8.25 पर पहुंची। दिल्ली से इस ट्रेन में लगभग 80 लोगों की टीम गुवाहाटी पहुंची और अलग-अलग होटल में सभी को कमरे दिए गए रात्रि भोजन कर विश्राम के लिए अपने-अपने कमरे में चले गए।
17 नवम्बर को कामाख्या देवीमन्दिर(शक्तिपीठ) दर्शन करने है दर्शन हेतु हमने आन-लाइन वीआईपी पास लिया है जोकि 501रुपये जमा करने पर मिल गया था। इसमें पुजारी का चयन हमें करना होता है जो कि रमेश शर्मा को हमने चुना और उनके फोन पर सूचना दे दी। दर्शन के लिए उन्होंने 2:00 बजे बाद का समय बताया।
17 नवम्बर 20204 को सुबह कमरे की घंटी बजी गरमागरम चाय लेकर लड़का आया था। चाय लेकर चाय पी और जल्दी ही फ्रेश होकर तैयार हुए और नीचे नाश्ते की टेबल पर पहुंच गए। वहां पोहा ,समोसा नाश्ते में था, क्योंकि पोहा और समोसा हमारा मनपसंद नाश्ता नहीं था फिर भी नाश्ता करने के बाद हमारा मां कामाख्या मंदिर में दर्शन का 2:00 बजे के बाद बुकिंग था सो हम गुवाहाटी में उमानंद(शिव- पार्वती) मंदिर में दर्शन के लिए निकल पड़े उमानंद में मंदिर जो की सैकड़ो साल पुराना है वहां जाने के लिए गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पार कर जाना होता है दो विकल्प है आप उड़न खटोले से जा सकते हैं या स्टीमर से₹200 प्रति व्यक्ति आने-जाने का किराया है। एक छोटे से टापू पर बना या मंदिर अपने आप में प्रकृति की गोद में ब्रह्मपुत्र नदी के चारों तरफ जलाशय के बीचो-बीच एक ऊंचे टापू पर बना हुआ है। वहां पहुंचकर प्रसाद फूल अगरबत्ती लेकर दर्शन के लिए कुछ खड़ी सीधी चढ़ाई कर मंदिर में पहुंचे गर्भ गृह में विधिवत पूजा-अर्चना किया ।
यह मंदिर दुनिया का यह सबसे छोटा बसा हुआ नदी द्वीप माना जाता है। ब्रह्मपुत्र के तट पर उपलब्ध देशी नावें आगंतुकों को द्वीप पर ले जाती हैं। जिस पहाड़ पर मंदिर बना है उसे भस्मकला के नाम से जाना जाता है। इसे राजा गदाधर सिंह के आदेश पर 1694 ई. में बनवाया गया था , लेकिन 1867 में आए भूकंप में यह टूट गया था।
दंतकथाओं के अनुसार कहा जाता है कि शिव ने भयानंद के रूप में यहाँ निवास किया था। कालिका पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में शिव ने इस स्थान पर भस्म छिड़की थी और पार्वती (उनकी पत्नी) को ज्ञान प्रदान किया था। ऐसा कहा जाता है कि जब शिव इस पहाड़ी पर ध्यान में थे, तो कामदेव ने उनके योग को बाधित किया और इसलिए शिव के क्रोध की अग्नि से जलकर राख हो गए और इसलिए पहाड़ी को भस्मकला नाम मिला।
इस पर्वत को भस्मकूट भी कहा जाता है। कालिका पुराण में कहा गया है कि उर्वशीकुंड यहीं स्थित है और यहां देवी उर्वशी निवास करती हैं जो कामाख्या के भोग के लिए अमृत लेकर आती हैं और इसलिए इस द्वीप का नाम उर्वशी द्वीप पड़ा।
लगभग आधे घंटे में हमने टापू को छोड़ दिया। स्टीमर वाला आने जाने का किराया पहले ही ले चुका था, हम वापस आए और वहां से गुवाहाटी में बने बालाजी मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़े लगभग 1 घंटे की भीड़भाड़ भरे रास्तों से होते हुए मंदिर में पहुंचे वहां तीन मंदिर है पद्मनाभ मंदिर, माता दुर्गा जी की मंदिर और गणेश जी का मंदिर। तीनों मंदिरों में दर्शन कर वापस हम फैंसी बाजार के लिए निकल पड़े जहां रविवार होने की वजह से अधिकांश दुकानें बंद थी परंतु फिर भी लगभग 25% दुकान खुली थी जो दुकान बंद थी उनकी दुकानों के आगे काफी गहमागहमी थी, तरह-तरह के कपड़े फुटपाथ में लगे हुए थे। हम एक बड़ी सी दुकान में गए पत्नी रंजू तिवारी के लिए दो साड़ियां ली जो की आसामी स्टाइल में वहां के लोकल बनावट और एक काजीरंगा शैली में थी और एक असमी कढ़ाई में। खरीदारी करने के बाद वापस होटल आए जहां दोपहर का लंच लेकर कुछ देर आराम किया और फिर मां कामाख्या देवी के दर्शन के लिए आठ लोग हम निकल पड़े हम दोनों का ₹501 का ऑनलाइन दर्शन का टिकट था वहां जाकर कंप्यूटर कक्ष में अपना टिकट निकलवा कर पुजारी जी को फोन किया। हमारे साथ जो गाइड थे वह हमें लाइन में लगाकर चले गए एक हाल में बैठे थे। इस समय हमने एक फोटो स्टेट्स फेसबुक पर डाला ,फेसबुक स्टेटस देखकर एक हमारे ऋषिकेश के दुर्गेश तिवारी जो की हमारे उनसे अतरंग संबंध थे देखकर हमें कॉल किया और बोले आप कहां है? हमने पता बताया वह आए और हम दोनों को विशेष एंट्री से जल्दी ही लाइन में लगवा दिए जहां लगभग आधे घंटे बाद हमारा नंबर आ गया! पुजारी जी को फोन करने के बाद वह तो नहीं आए पर उनका भाई मुन्ना पंडित आए और विधिवत मां कामाख्या देवी का पूजा अर्चना करवा कर गर्भ-गृह से हम बाहर आए ।
आपको बता दें कि कामरूप कामाख्या मंदिर या कामाख्या मंदिर, गुवाहाटी, असम और उपमहाद्वीप में सबसे पुराने हिंदू मंदिरों में से एक है। यह मंदिर नीलाचल पहाड़ियों पर है। यह सबसे पुराने और सबसे पूजनीय स्थानों में से एक है जहाँ तांत्रिक साधनाएँ की जाती हैं। इसका नाम माँ देवी कामाख्या के नाम पर रखा गया है।
सनातन धर्म के अनुसार, कामाख्या मंदिर का निर्माण तब हुआ जब हिंदू देवी पार्वती ने भगवान शिव को उनके लिए एक मंदिर बनाने का आदेश दिया ताकि वह तब तक शांति से ध्यान कर सकें जब तक कि उन्हें अपने लिए उपयुक्त पति न मिल जाए। यह स्थान उस जगह पर पाया गया जहाँ हर साल देवी के मासिक धर्म के सम्मान में अम्बुबाची मेला आयोजित किया जाता है।
कामाख्या मंदिर की संरचना 8वीं या 9वीं शताब्दी की है, लेकिन तब से इसे कई बार फिर से बनाया गया है। इसकी अंतिम संकर शैली को नीलाचल कहा जाता है। यह शाक्त हिंदू परंपरा के 51 पीठों में से एक है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से पहले कामाख्या मंदिर के बारे में बहुत कम लोग जानते थे। 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन के दौरान, यह बंगाली शाक्त हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बन गया।
पहले, कामाख्या मंदिर वह स्थान था जहाँ स्थानीय लोग देवी कामाख्या की पूजा करते थे। आज भी, मुख्य पूजा प्राकृतिक पत्थर में स्थापित अनिकोनिक योनि की होती है । शक्ति पीठ हिंदू देवी सती और पार्वती को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। यह 51 शक्ति पीठों में से एक है (जिसे अष्ट-पीठम या अष्ट-पीठ भी कहा जाता है) और तांत्रिक उपासकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है।
पूजा अर्चना के बाद हम वहां मंदिर के पास ही कुछ देर तक बैठे तभी दुर्गेश तिवारी का फोन आया आपका दर्शन हो गया हूं तो आप अन्नपूर्णा होटल में बैठा हुआ हूं,आप आ जाओ वहां जाने के बाद चाय नाश्ता किया और वह हमें एक बगलामुखी सिद्ध पीठ में ले गए जो की ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है काफी संख्या में ब्राह्मणों द्वारा जप तप तक किया जा रहा था वहां भी हमने पूजा अर्चना की और बस स्टैंड आकर अपने साथियों के साथ होटल पहुंचे और रात का डिनर सामूहिक रूप से लेकर सो गए।

चौथे दिन प्राकृतिक सौन्दर्य का अवलोकन किया जिसमें प्रमुख रूप से चेरापूंजी के आसपास के दृश्य का अवलोकन किया चेरापूंजी स्थित एक पार्क में हमने लंच किया और वहां के आसपास की विभिन्न जगह में जिसमें प्रमुख रूप से मासमाईक गुफा मासमाईक गुफा मेघालय की एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और अद्वितीय गुफा संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है। यह गुफा मेघालय के चेरापूंजी में स्थित है, जो दुनिया के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है।
मासमाईक गुफा की विशेषताएं- अद्वितीय गुफा संरचनाएं: गुफा में अद्वितीय चूना पत्थर की संरचनाएं हैं, जो प्राकृतिक रूप से बनी हैं। सुंदर जलप्रपात: गुफा के पास सुंदर जलप्रपात हैं, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। प्राकृतिक सुंदरता: गुफा के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है, जो पर्यटकों को आकर्षित करता है। ट्रेकिंग और एडवेंचर: गुफा के आसपास के क्षेत्र में ट्रेकिंग और एडवेंचर की सुविधाएं हैं।
आप मासमाईक गुफा जाने के लिए चेरापूंजी, मेघालय से जा सकते हैं। सबसे अच्छा समय अक्टूबर से अप्रैल तक है।
यात्रा के लिए आप गुवाहाटी से चेरापूंजी तक फ्लाइट या बस से यात्रा करें, फिर टैक्सी या ऑटो रिक्शा से गुफा तक जाएं। चेरापूंजी में आसपास कई झरने और जलप्रपात है,जिनका मनमोहक दृश्य देखकर एक आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। चेरापूंजी में एक छोटा सा मार्केट भी है जहां वहां के स्थानीय उत्पादन बिकते हैं, आप वहां खरीदारी भी कर सकते हैं ,वहां आप वहां से मसाले,शहद, दालचीनी, हल्दी, गर्म टोपी ,वहां के बने हुए स्थानीय शाल, स्वेटर भी आपको वहां मिल सकते हैं। आप वहां खरीदारी कर सकते हैं। हमने भी दोस्तों के साथ कुछ खरीदारी की और वहां से घूमते हुए हम शिलांग होटल पहुंचकर सामुहिक रूप से स्वादिष्ट डीनर का आनंद लिया,रात्रि विश्राम शिलांग किया।
सुबह जल्दी ही तैयार होकर होटल के अपने-अपने रूम से सब नीचे आए और गाड़ी में सवार होकर प्राकृतिक दृश्य के अवलोकन हेतु निकल पड़े। रास्ते में मीठे-मीठे झरने ,शिलांग की पहाड़ियों का दर्शन करते हुए वर्ड्स झील गए। उसे दिन वहां झील के अंदर मेला लगा हुआ था। आम दिनों में वहां टिकट 20 से 30 रुपए मिलते है लेकिन उसे दिन ₹100 का टिकट प्रति व्यक्ति देना पड़ा। काफी भीड़भाड़ थी, स्थानीय लोगों के अलावा बाहर से भी काफी लोग आए थे। टिकट लेकर हम सपत्नीक अंदर गए हमारे कुछ मित्र गए और कुछ नहीं गए अंदर जाकर लगभग 1 घंटे तक हमने वह विभिन्न पंडालों ,एग्जीबिशन का अवलोकन किया। तत्पश्चात डॉन बॉस्को संग्रहालय के लिए निकल पड़े। डॉन बॉस्को स्कूल के प्रांगण में गाड़ियां पार्किंग हुई। डॉन बॉस्को स्कूल में संग्रहालय में घूमने के लिए टिकट लेना पड़ता है₹50 प्रति व्यक्ति चार्ज है 7 मंजिल पर बने इस संग्रहालय में मानवीय सभ्यता को दर्शाया गया है। पाषाण युग से लेकर चांद पर पहुंचने तक के सफर एवं उपग्रहों को दिखाया गया है। समाज में विभिन्न व्यक्तियों के योगदान को कुशलतापूर्वक सचित्र चित्रण किया गया है। स्थानीय लोग किस प्रकार धीरे-धीरे पाषाण युग से अपनी तरक्की के रास्ते को चलते हुए यहां तक पहुंचे। डॉन बॉस्को स्कूल के प्रांगण में काफी सफाई की व्यवस्था थी और वहां सातों मंजिलों पर बनाए गए कलाकृतियों मूर्तियां को लोग देखकर अचंभित हो रहे थे, सभी मूर्तियों को करीने से स्थानीय पोशाक से सुसज्जित कर संग्रहित किया गया था। पुतले इस प्रकार से बने थे मानो अभी बोल पड़ेंगे।
डॉन बॉस्को म्यूजियम ऑफ इंडिजिनस कल्चर को 2004-2005 में डॉन बॉस्को सेंटर फॉर इंडिजिनस कल्चर (DBCIC) की सबसे दृश्यमान शाखा के रूप में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए सुलभ बनाया गया था। यह केंद्र डॉन बॉस्को के सेल्सियन के रूप में जानी जाने वाली धार्मिक मण्डली का एक उपक्रम है और इसका नेतृत्व 1990 के दशक में फादर सेबेस्टियन कारोटेम्परेल ने किया था। डॉन बॉस्को संग्रहालय 2016 के लिए भारत के शीर्ष 10 संग्रहालयों और एशिया के सर्वश्रेष्ठ 25 संग्रहालयों में शामिल है। दिल्ली स्थित वास्तुकार विवेक वर्मा द्वारा डिजाइन की गई इसकी संरचना को इसके अद्वितीय षट्कोणीय आकार, सात मंजिलों और स्काईवॉक के कारण शिलांग का आधुनिक वास्तुशिल्प चमत्कार
माना जाता है जो शहर का 360 डिग्री दृश्य प्रस्तुत करता है। संग्रहालय में दूसरी गैलरी, जिसे अलकोव गैलरी कहा जाता है, में 10 अलकोव हैं जो विभिन्न उत्तर पूर्वी जनजातियों और उनके निवास स्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं। संग्रहालय में एक वेशभूषा और आभूषण गैलरी भी है जो कई जनजातियों के पारंपरिक परिधान और आभूषण प्रदर्शित करती है, जो हमें उनकी पहचान और विरासत के एक महत्वपूर्ण पहलू की झलक देती है।
पारंपरिक प्रौद्योगिकी गैलरी में मिट्टी के बर्तन बनाने, चावल की बीयर बनाने, टोकरी बनाने, बुनाई, लोहार और सुनार, लकड़ी की नक्काशी, चमड़ा बनाने और बेंत बनाने जैसी पारंपरिक शिल्प तकनीकों को प्रदर्शित किया गया है। जबकि फूड गैलरी में पूर्वोत्तर भारत के कई स्वदेशी व्यंजन उपलब्ध हैं। मेघालय से पोर्क चॉप और बांस के अंकुर, मणिपुर से जंगली चावल और मछली, खासियों के जदोह और तुंगरींबाई और गारो के वाकपुरा सभी फूड गैलरी में उपलब्ध हैं।
लगभग 2 घंटे वहां घूमने के बाद सभी लोग अपनी-अपनी गाड़ी में बैठकर आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े।
पाचवें दिन हम न्यूजलपाईगुडी के लिए ट्रेन से प्रस्थान किया। न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचकर गाड़ियों से गंगटोक के लिए प्रस्थान किया सुबह वॉटर फॉल्स फूलों की प्रदर्शनी बुद्धिस्ट मंदिर का दीदार करते हुए रात्रि विश्राम गंगटोक में किया। रात्रि विश्राम कर सातवें दिन छांगू लेक, बाबा हरभजन सिंह मंदिर के लिए सड़क के रास्ते प्रस्थान किया। आपको बता दे की छांगू झील प्रकृति के खूबसूरत नजारों में से एक है यह झील करीब 12400 फीट की ऊंचाई पर है इस झील के चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़ नीला आकाश और झील में पहाड़ों की प्रतिबिंब परियों की कहानी जैसा नजारा दिखता है हालांकि गाइड द्वारा यह बातें हमें बताई गई परंतु जब हम गए वहां पर हल्की-हल्की बर्फ की चादर दिख रही थी। मौसम बहुत सुहाना था सर्दी पड़ रही थी और वहां पर हमने याक बैल की सवारी की दोनों ने पूरी टीम के साथ खूबसूरत वादियों का नजारों का अवलोकन किया।
आपको बता दें कि गंगटोक से केवल 37 किमी दूर गंगटोक-नाथुला राजमार्ग पर स्थित छांगू झील सिक्किम के सबसे शानदार परिदृश्यों में से एक है। स्थानीय बौद्ध और हिंदू इस झील को पवित्र झील के रूप में मानते हैं। लगभग 48 फीट गहरी और 1 किलोमीटर में फैली शानदार छांगू झील अपने सुरम्य वातावरण से रोमांचित करती है। झील का पानी इसके आसपास के पहाड़ों की बर्फ के पिघलने से आता है, यही वजह है कि यह झील कभी सूखती नहीं है। दरअसल, छांगू झील लुंगत्से चू नदी का उद्गम स्थल भी है । यह नीली झील सर्दियों के दौरान पूरी तरह जमी रहती है।यह अंडाकार आकार की गहरी नीली झील दूर से देखने पर आंखों को सुकून देती है। न्यू बाबा मंदिर के रास्ते में इसे पार करने के बाद आपको झील का सबसे बेहतरीन नज़ारा देखने को मिलेगा । सर्दियों के दौरान झील और उसके आस-पास का इलाका बर्फ से ढका रहता है। यह नज़ारा वाकई बहुत ही शानदार होता है। अप्रैल तक झील जमी रहती है। वसंत के अंत में, झील जंगली फूलों से घिर जाती है, जो रंगों का एक अलग ही नज़ारा पेश करते हैं। रोडोडेंड्रोन, नीले और पीले खसखस, प्रिमुला की विभिन्न प्रजातियाँ, आईरिस एक मनमोहक प्रभाव पैदा करते हैं। गंगटोक से छांगू झील की यात्रा भी काफी आकर्षक है, जहाँ आप रास्ते में कई झरने देख सकते हैं।
झील के प्रवेश द्वार पर एक छोटा पुल आपको एक व्यूपॉइंट सह कैफेटेरिया तक ले जाएगा, जहाँ से आप पूरी झील और उसके आसपास के पहाड़ों को देख सकते हैं। झील के किनारे भगवान शिव को समर्पित एक छोटा मंदिर भी बना है। आप सर्दियों के दौरान गहरी बर्फ में झील के किनारे ट्रेकिंग कर सकते हैं या झील के तट पर याक की सवारी भी कर सकते हैं। छांगू झील में प्रवेश करने से पहले एक छोटा सा देहाती बाज़ार है जो पर्यटकों को याक का पनीर, ट्रिंकेट और स्थानीय कलाकृतियाँ बेचता है। रोमांच चाहने वाले आसपास के क्योनक्नोसला अल्पाइन अभयारण्य में ट्रेकिंग का आनंद भी ले सकते हैं। यहाँ से आपको बर्फ के जूते और गमबूट भी किराए पर मिल जाएँगे। इस क्षेत्र में मोमोज और चाय बेचने वाली कुछ खाने-पीने की दुकानें भी हैं। गंगटोक – नाथुला राजमार्ग छांगू झील के किनारे से गुजरता है और सेराथांग से न्यू बाबा मंदिर और नाथुला पॉइंट तक पहुँचता है।
छांगू झील मिथकों और किंवदंतियों से घिरी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में लामा (बौद्ध संत) झील के रंग को देखकर भविष्य की भविष्यवाणी करते थे। अगर झील के पानी का रंग गहरा होता था, तो वे भविष्य को अंधकारमय और उदास, अशांति से भरा हुआ बताते थे। सिक्किम के आस्था-संतों, जिन्हें झाखरी के नाम से जाना जाता है , भी गुरु पूर्णिमा के दौरान प्रार्थना करने के लिए इस झील पर आते हैं। लेकिन इस झील में केवल इंसान ही नहीं आते हैं; यह ब्राह्मणी बत्तखों का भी घर है और प्रवासी पक्षियों की अन्य प्रजातियों के लिए भी यह पसंदीदा पड़ाव है। छांगू झील पर आवास की कोई सुविधा नहीं है।
छांगू झील घूमने का सबसे अच्छा समय है सर्दियों के दौरान (जनवरी से मध्य मई तक) छांगू झील पूरी तरह से बर्फ से ढकी रहती है और आप झील के किनारों पर बर्फ पर ट्रेकिंग के साथ-साथ याक की सवारी का भी आनंद ले सकते हैं। अक्टूबर से दिसंबर तक, झील आंशिक रूप से बर्फ की चादर से ढकी रहती है और प्रवासी पक्षियों को झील के पानी में टहलते हुए देखा जा सकता है। अप्रैल से जुलाई तक, आप फूलों के अच्छे खिलने को देख सकते हैं। साल के अधिकांश समय, छांगू झील में शानदार मौसम रहता है।

छांगू झील घूमने के बाद बाबा हरभजन सिंह मंदिर के लिए प्रस्थान किया। बाबा हरभजन सिंह का मंदिर चीन तिब्बत के बॉर्डर पर स्थित है। आपको बता दें कि हमारे देश के सैनिक हर वक्त दुश्मनों से देश की रक्षा करते हैं, लेकिन क्या आप उस सैनिक के बारे में जानते हैं जिसके लिए देश का जज्बा ये है कि वो मरने के 48 सालों बाद भी देश की रक्षा कर रहा है. आपको ये बात सुनने में जरुर अजीब लग रही होगी, लेकिन सिक्किम सीमा पर हरभजन सिंह आज भी देश की रक्षा कर रहे हैं. इतना ही नहीं, इस सीमा पर उनका एक मंदिर भी बना हुआ है. जहां सैनिक दर्शन के लिए भी जाते हैं और उनकी देखभाल भी करते हैं. हरभजन सिंह का डर इतना है कि दुश्मन भी उनके नाम से डरते हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि सैनिकों का मानना है कि चीन की ओर से रची जा रही साजिशों के बारे में सैनिक हरभजन पहले से ही बता देते हैं.
चीनी सैनिक भी करते हैं बाबा हरभजन सिंह पर यकीन-
बाबा हरभजन सिंह की ताकत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि चीन के सैनिक भी बाबा हरभजन सिंह की आत्मा पर यकीन करते हैं और उनसे डरते भी हैं. बाबा हरभजन सिंह के मंदिर में जब सैनिक जाते हैं तो उन्हें उनके होने का एहसास होता है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब भी भारत और चीन की मिटिंग होती है तो बाबा हरभजन सिंह के लिए बकायदा एक कुर्सी खाली रखी जाती है, ताकि वो भी दोनों देशों के बीच होने वाली चर्चाओं में भाग ले सकें.
सिक्किम बॉर्डर पर तैनात सैनिकों का कहना है कि मरने के बाद भी बाबा बॉर्डर पर अपनी ड्यूटी लगातार करते हैं. इसके लिए बाबा हरभजन सिंह को बकायदा सैलरी भी दी जाती है. सेना में उनकी एक रैंक भी है. कुछ समय पहले तक उन्हें छुट्टी पर पंजाब में उनके गांव भेजा जाता था. हालांकि कुछ लोगों ने जब इसपर आपत्ति जताई तब से उन्हें छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया गया. अब हर साल बारह महीने बाबा ड्यूटी पर रहते हैं.
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है, जिसमें प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाया जाता है. वहीं कमरे में बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते हैं. लोगों का कहना है कि रोज सफाई करने के बावजूद उनके जूतों में कीचड़ और चादर पर सलवटें मिलती हैं.
कौन थे बाबा हरभजन सिंह?हरभजन सिंह का जन्म जन्म 30 अगस्त 1946 को गुजरावाला में हुआ था. वो सेना में अपनी सेवाएं महज दो साल ही दे पाए थे कि 2 साल बाद सिक्किम में हुए एक हादसे में उनकी जान चली गई.
दरअसल एक दिन खच्चर से बाबा हरभजन सिंह नदी पार कर रहे थे, तभी नदी के तेज बहाव में वो बह गए. उनका शव नदी के पानी में इतना दूर चला गया था कि दो दिन की गहन तलाशी के बाद भी नहीं मिल सका. इसके बाद हरभजन सिंह एक सैनिक के सपने में आए और उन्हें अपने शव के बारे में बताया. वो सैनिक दूसरे दिन बाकि सैनिकों के साथ उसी जगह पर गया तो उन्हें हरभजन सिंह का शव मिल गया. तभी से बाबा हरभजन सिंह के बंकर को मंदिर का रूप दे दिया गया था.मंदिर और बार्डर के भ्रमण के बाद हम वापस होटल आए और सामुहिक रूप से रात्रि भोजन लेने हॉल में पहुंच गए।
टीम गाइड गगन छेत्री ने बताया कि कल सुबह 3:00 बजे उठना है और टाइगर हिल पर सनराइज प्वाइंट के लिए जाना है जहां से खूबसूरत कंचनजंगा और सूर्योदय का दर्शन होगा वह 4:00 बजे पहुंचना बेहद जरूरी है हम सब रात्रि डिनर लेकर अपने-अपने रूम में चले गए सुबह 3:00 बजे दरवाजे की घंटी बजी बेड टी लेकर तैयार होकर सभी लोग नीचे पहुंचे वहां फोर व्हीलर से हम सनराइज और कंचनजंगा की पहाड़ियों को देखने के लिए निकल पड़े। ज्ञात हो कि सूर्योदय के समय, कंचनजंगा की चोटियाँ सूरज के कम ऊँचाई पर दिखाई देने से पहले ही चमक उठती हैं। टाइगर हिल से माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर) ठीक से दिखाई देता है। कंचनजंगा (8598 मीटर) पृथ्वी की वक्रता के कारण माउंट एवरेस्ट से अधिक ऊँचा दिखाई देता है, क्योंकि यह एवरेस्ट से कई मील निकट है। टाइगर हिल से एवरेस्ट तक सीधी रेखा में दूरी 107 मील (172 किमी) है।
साफ़ दिन पर, दक्षिण में कुर्सेओंग दिखाई देता है और दूर-दूर तक तीस्ता नदी, महानंदा नदी, बालासन नदी और मेची नदी दक्षिण की ओर बहती हुई दिखाई देती हैं। तिब्बत का चुमाल री पर्वत, 84 मील (135 किमी) दूर, चोला रेंज के ऊपर दिखाई देता है। जिस दिन हम टाइगर हिल गए उसे दिन आसमान में बादल छाए हुए थे, काफी इंतजार के बाद सूर्य देव का तो दर्शन हुआ पर पहाड़ों के बीच में हल्की-फुल्की बर्फ से लकदक कंचनजंगा की पहाड़ियों का दीदार हो पाया।
टाइगर हिल से 7:00 बजे हमारी वापसी हुई गाड़ी में बैठकर हम सब बताशिया लूप, जापानी मन्दि मैरी-टी-गार्डन, पीकपैगोडा, तेनजिंग रॉक घूमते हुए दोपहर को होटल पहुंचे जहां लंच लेकर थोड़ा विश्राम किया और गंगटोक में खरीदारी के लिए प्रस्थान किया।
गंगटोक बेहद साफ सुथरा शहर है,गंदगी का नामोनिशान या नहीं है। गंगटोक में मुख्य रूप से एमजी रोड सिक्किम का प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र है। यह शॉपिंग सेंटर सिक्किम की राजधानी गंगटोक में स्थित है। यह शॉपिंग सेंटर शहर के बीचोबीच आकाश के नीचे एक खुले मॉल की तरह है। यह सेंटर सभी प्रमुख दुकानों, रेस्तरां, कैफे, आदि के लिए हॉटस्पॉट है। एमजी रोड मार्केट एक ऐसी जगह है, जहाँ आप मशहूर सिक्किम चाय की अनेक वैरायटियां एवं धार्मिक झंडे सहित कुछ भी खरीद सकते हैं। इस मार्केट में आप सिक्किम के पारंपरिक कपड़े, हाथ से बने अचार और विभिन्न हस्तकला के सामान भी खरीद सकते हैं।
दुसरी मार्केट है लाल बाजार सिक्किम में सब्जियों और फलों का मुख्य बाजार है। यह पूर्वी सिक्किम में स्थित है। बाजार से स्थानीय ग्रामीणों द्वारा यहां बेचे जाने वाले फल और सब्जियां यहां के लोगों का मुख्य आकर्षण है। नॉनवेज खाने वालों के लिए सूखी मछलियां और चाइनीज फूड के अनेक व्यंजनों का मुख्य केन्द्र है। यह एमजी रोड मार्केट के करीब स्थित है। इसलिये यहां पर आने वालों की भीड़ अधिक लगी रहती है।
तीसरा मार्केट गंगटोक के शहर के बीच में स्थित यह न्यू मार्केट निस्संदेह सिक्किम में सबसे लोकप्रिय खरीदारी स्थानों में से एक है। बाजार में ड्राई फ्रूट्स, बर्फी, और मीठे आम के व्यंजन खरीदने के लिए कुछ बेहतरीन आइटम मिलते हैं। न्यू मार्केट में बहुत सारी रंगबिरंगी छोटी-छोटी दुकानें हैं, जो काफी आकर्षक दिखती हैं। यहां पर सूखे आम के व्यंजनों की खरीदारी के लिए न्यू मार्केट जाने की सलाह दी जाती है।
इसके साथ ही सिक्किम में ओल्ड मार्केट खरीदारी की सबसे जीवंत जगहों में से एक है। बाजार एमजी मार्ग में स्थित है, जो फैशन के कपड़ों, हस्तशिल्प और अन्य फैशन से संबंधित सामान के लिए बहुत प्रसिद्ध है। पूरे साल पर्यटकों के साथ यह बाजार हमेशा गुलजार रहता है। डोगरा ज्वैलरी पुराने बाजार से खरीदारी करने के लिए प्रसिद्ध वस्तुओं में से एक है। इसके अलावा बहुत अच्छी क्वालिटी के साथ उचित मूल्य पर अखरोट, बादाम भी खरीद सकते हैं।
हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था चार धाम मंदिर और द्वादश ज्योतिर्लिंग जो की नामची से कुछ ही दूरी पर नामची जिले में विशाल भूखंड पर बना हुआ है आपको बता दे की सिक्किम में धार्मिक महत्व को दर्शाता चार धाम नामची सिक्किम या सिद्धेश्वर धाम सिक्किम के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है । भूटिया में नामची का अर्थ आकाश (नाम) ऊँचा (ची) होता है। यह मंदिर समुद्र तल से 5,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यह 7 एकड़ से अधिक भूमि पर फैला हुआ है और इसके परिसर में कई अन्य धार्मिक स्थल जैसे साईं बाबा मंदिर, किरातेश्वर प्रतिमा के अलावा नंदी बैल, साईं द्वार, किरातेश्वर प्रतिमा, साईं मंदिर, किरात द्वार, शिव द्वार और संगीतमय फव्वारा शामिल हैं।
इस स्थान पर शिव भक्त और अन्य लोग पूजा करते हैं क्योंकि सोलोफोक पहाड़ी की चोटी पर 33 मीटर ऊंची विशाल शिव प्रतिमा स्थापित है। शिव के शिकारी अवतार किरातेश्वर की 18 फुट ऊंची प्रतिमा भी यहीं स्थित है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि अग्निकुंड में सती को खोने के बाद भगवान शिव एकांत में चले गए थे और सिक्किम के जंगलों में शिकारी बन गए थे।
सिद्धेश्वर धाम का निर्माण श्री जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने नवंबर 2011 में करवाया था। यह भारत के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों और चार धामों की प्रतिकृति है। हिंदुओं के चार सबसे प्रतिष्ठित धाम जगन्नाथ, बद्रीनाथ, द्वारका और रामेश्वरम को इस शानदार परिसर में दोहराया गया है। ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करने वाला एक धार्मिक स्थान है। ज्योति का अर्थ है चमक और लिंगम शिव का प्रतीक है।
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर हमने वन्य जीव अभ्यारण चिड़ियाघर पहुंचे वहां कुछ खास तो नहीं था पर कुछ अलग हटके था गोरखा रेजीमेंट का एक सुंदर सा संग्रहालय बना हुआ था जिसमें माउंट एवरेस्ट की चोटी को पता करने वाले भारतीय वीरों की इस्तेमाल कई की गई विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का संग्रह था किस प्रकार उन्होंने सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर तिरंगा लहराया था वह सारी कहानी उनके द्वारा फतह किए गए तारीख को करीना से चित्र के माध्यम से संयोजित किया गया था।
इस पूरे यात्रा का आयोजन मां गंगे शिव शंकर यात्रा कंपनी दिल्ली जयपुर ऋषिकेश के संयोजन में किया गया था। हमारी टीम में आनेक लोग थे लेकिन खास तौर पर विनोद कपूर पूर्व आईएएस एवं उनके परिवार जयपुर से, जयपुर से ही विष्णु कुमार जोशी एवं उनकी मैडम देहरादून से डॉक्टर एके गर्ग एवं उनकी पत्नी,मन्शाराम गोयल एवं उनकी मैडम दिल्ली से,सभी लोग इस पूरे पूर्वोत्तर भारत के यात्रा का भरपूर आनंद लिया। जगह-जगह हमने स्थानीय ड्रेस पहनकर फोटो सेशन करवाएं। यात्रा के दौरान खाने-पीने चाय नाश्ते की बहुत अच्छी व्यवस्था थी। अनुभवी गाइडों द्वारा यात्रा के दौरान सभी का अच्छे ढंग से मार्गदर्शन किया गया और समय पर सबको भोजन पानी की व्यवस्था गाड़ियों की व्यवस्था होटल की व्यवस्था बेहद शालीनता के साथ जिम्मेदारी के साथ किया गया। स्वयं पुष्पेंद्र अग्रवाल हमारे साथ थे, सभी का भरपूर खयाल देखभाल करने में लगे हुए थे। गाइड गगन छेत्री ,गोलू, भोला सभी लोग बड़े ही विनम्र व्यवहार के थे। जो रसोई चल रही थी सरदार जी यात्रा के दौरान नए व्यंजन बनाकर सभी यात्रियों की व्यवस्था बनाए रखने में लगे हुए थे। सब लोग इस यात्रा से बेहद संतुष्ट और खुश नजर आए।
दसवें दिन न्यू जलपाईगुड़ी से राजधानी एक्सप्रेस से हम अपनी-अपने आरक्षित सीटों पर बैठकर दूसरे दिन नई दिल्ली पहुंचे। वहां से हमारा ऋषिकेश के लिए जनशताब्दी में रिजर्वेशन था 8:00 बजे लगभग हरिद्वार पहुंचे। जहां मेरे ज्येष्ठ पुत्र तरुण राज तिवारी कार लेकर आए थे कार में सवार होकर 9:30 बजे हम अपने घर सकुशल ऋषिकेश पहुंच गए।
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